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भारती राजपूत: मिशन अंकुर के संग बच्चों में शिक्षा की नई उमंग

Feb 17, 2026

एक समर्पित शिक्षक वही होता है जो परिस्थितियों की कठिनाइयों को अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने देता, बल्कि उन्हें बच्चों के भविष्य को संवारने की प्रेरणा बना लेता है। सीहौर ज़िला के प्राथमिक शाला नयाखंडबाद की शिक्षिका भारती राजपूत ने अपने समर्पण, नवाचार और बच्चों के प्रति गहरे लगाव से यही साबित किया है।

भारती राजपूत, शिक्षिका, प्राथमिक शाला नयाखंडबाद, सीहौर, मध्य प्रदेश

जुलाई 2013 में जब भारती ने अपनी सेवा की शुरुआत की, तो रास्ता आसान नहीं था। कच्ची सड़कें, कोई साधन नहीं, और रोज़ तीन किलोमीटर पैदल सफर—बरसात में कीचड़ से भरे रास्तों पर कई बार गिरते-संभलते हुए भी वे स्कूल पहुँचना नहीं छोड़ती थीं। कई बार रास्ते में मिल जाने वाले ट्रैक्टर का सहारा लेकर वे विद्यालय पहुँचतीं, लेकिन उनका संकल्प कभी नहीं डगमगाया।

शुरुआती दिनों में स्कूल में बच्चों की संख्या कम थी, पर धीरे-धीरे बच्चों और उनके परिवारों से उनका जुड़ाव गहराता गया। बच्चे उनका इंतज़ार करते, और यही विश्वास उनके लिए सबसे बड़ा प्रोत्साहन बन गया। उन्होंने समझा कि बच्चों की ज़िंदगी, उनके अनुभव और परिवेश को जाने बिना सीखना प्रभावी नहीं हो सकता।

मिशन अंकुर और एफएलएन कार्यक्रम से जुड़ने के बाद उन्हें शिक्षक संदर्शिका मिली, जिसने कक्षा को और अधिक जीवंत बनाने में मदद की। उन्होंने त्योहारों, रोज़मर्रा के अनुभवों और स्थानीय संदर्भों को पढ़ाई का हिस्सा बनाया। जब बच्चों ने दीपावली के अपने अनुभव साझा किए—रंगोली, मिठाइयाँ, नए कपड़े—तो कक्षा सीखने के साथ-साथ संवाद का मंच बन गई।

“जब बच्चे अपने अनुभवों से सीखते हैं, तो पढ़ाई उनके लिए किताबों का विषय नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन जाती है।”

भारती राजपूत बच्चों के साथ बातचीत करते हुए

ग्रामीण परिवेश में कई बच्चे घर के कामों और मवेशी चराने के कारण पढ़ाई से दूर हो जाते थे। भारती ने खेल-आधारित गतिविधियों और सहभागिता वाली पद्धतियों से उन्हें जोड़ना शुरू किया। अब बच्चे अपने काम पूरे करके भी स्कूल आते हैं और पढ़ाई में सक्रिय भाग लेते हैं।

उन्होंने स्थानीय संसाधनों से टीएलएम तैयार करना अपनी दिनचर्या बना लिया—लकड़ी के गुट्टों से पासा, कागज़ के नोटों से गणित, और रेत पर उँगलियों से गिनती सिखाना। इन तरीकों ने बच्चों के सीखने को सरल और रोचक बना दिया। परिणामस्वरूप, उपस्थिति बढ़ी, नामांकन में सुधार हुआ और तीसरी कक्षा के बच्चे हिंदी और गणित में बेहतर प्रदर्शन करने लगे।

“बच्चों की मुस्कान और उनकी प्रगति ही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है—यही मुझे हर दिन आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।”

आज जहाँ पहले दस में से केवल दो बच्चे स्कूल आते थे, वहीं अब आठ बच्चे नियमित हो गए हैं। माता-पिता भी शिक्षा के महत्व को समझने लगे हैं और बच्चों को स्कूल भेजने में सहयोग कर रहे हैं।

यह यात्रा संघर्षों से भरी थी, लेकिन समर्पण, नवाचार और विश्वास ने इसे सफलता की कहानी बना दिया। भारती राजपूत का प्रयास दिखाता है कि जब शिक्षक दिल से काम करते हैं, तो विद्यालय केवल पढ़ाई की जगह नहीं रहता—वह बच्चों के सपनों को आकार देने वाला केंद्र बन जाता है।

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