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माधवी गौर: शिक्षा, जीवन की निरंतर यात्रा
Feb 17, 2026
एक सच्चा शिक्षक वही होता है जो पढ़ाने को नौकरी नहीं, बल्कि निरंतर सीखने-सिखाने की यात्रा मानता है। माधवी गौर ऐसी ही शिक्षिका हैं, जो पीएस पहाड़खेड़ी, सीहौर के सरकारी विद्यालय में बच्चों के सीखने को अर्थपूर्ण और जीवंत बनाने में जुटी हैं।

एफएलएन (Foundational Literacy and Numeracy) पढ़ाते हुए उन्हें 12 वर्ष हो चुके हैं। इस लंबे अनुभव में उन्होंने यही सीखा कि बच्चों के जीवन में छोटा-सा सकारात्मक बदलाव भी शिक्षक के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होता है। उनके लिए शिक्षण का उद्देश्य केवल अक्षरज्ञान तक सीमित नहीं, बल्कि बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता को विकसित करना है।
माधवी हमेशा चाहती थीं कि बच्चे पढ़ना-लिखना सीखने के साथ-साथ जिज्ञासु बनें और अपनी समझ को गहराई दें। इसी सोच के साथ उन्होंने टीएलएम (Teaching Learning Material) को कक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया। वे बाज़ार से सामग्री खरीदने के बजाय स्वयं टीएलएम तैयार करती हैं, क्योंकि उनका मानना है कि शिक्षक द्वारा बनाए गए संसाधनों में एक भावनात्मक जुड़ाव होता है, जो बच्चों तक भी पहुँचता है।
“जब शिक्षक खुद सामग्री बनाता है, तो उसमें समर्पण झलकता है—और वही समर्पण बच्चों की सीखने की रुचि को बढ़ाता है।”
माधवी के अनुसार शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं है; यह बच्चों के भीतर छिपे कलाकार, वैज्ञानिक और लेखक को पहचानने और उन्हें विकसित करने का माध्यम है। वे कक्षा में ऐसी गतिविधियाँ शामिल करती हैं जो बच्चों को सोचने, सवाल पूछने और अपने विचार व्यक्त करने के लिए प्रेरित करें। उनका विश्वास है कि शिक्षक की जिम्मेदारी केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य को दिशा देना है।

उनकी प्रेरणा का स्रोत उनका परिवार भी रहा है। उनके पिता और ससुर ने हमेशा उन्हें ईमानदारी से पढ़ाने की सीख दी। यही संस्कार उनके शिक्षण में झलकते हैं—वे बच्चों को विषय ज्ञान के साथ-साथ जीवन मूल्यों की भी शिक्षा देती हैं।
आज के बदलते समय को देखते हुए माधवी मानती हैं कि पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ना जरूरी है। बच्चों की जिज्ञासा को जीवित रखने के लिए शिक्षकों को नए और रोचक तरीकों को अपनाना होगा, ताकि सीखना उनके लिए आनंददायक अनुभव बन सके।
“शिक्षक का काम कभी खत्म नहीं होता—यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें हर दिन कुछ नया सीखने और बच्चों को सिखाने का अवसर मिलता है।”
आज जब वे अपने छात्रों को आत्मविश्वास के साथ पढ़ते-लिखते देखती हैं, तो उन्हें अपनी मेहनत का परिणाम साफ दिखाई देता है। बच्चों की आँखों की चमक ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है।
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